"माई, अनोखी पगली हो तुम! किसको पता की राम यहाँ आयेंगे या नहीं और वो यहाँ क्यों आयेंगे| क्या वो तुमको जानते हैं? क्या तुमने कोई संदेसा भिजवाया है? विचित्र बातें करती हो तुम| इतना बड़ा संसार है| उन्हें क्या पता की कोई शबरी कई वर्षों से उनकी राह देख रही है| वो राजा हैं| तुम तों ऐसे ही भगवान् मान के बैठी हो| अरे, भगवान् हैं तों आये क्यों नहीं अभी तक| इतने वर्षों से देख रहा हूँ - प्रतिदिन पूजा करती हो, गहरे जंगले से फूल और फल चुनती हो, भजन गाती हो, रास्ते के कांटे साफ़ करती हो, लोगों के अट्टहास का विषय बनती हो| पागल हुए जा रही हो| क्यों दुःख देती हो इतना अपने को| तुम्हारे ह्रदय की पीर का रामजी को कुछ नहीं पता| तुम समझ क्यों नहीं रही हो, वो नहीं आयेंगे, वो नहीं आयेंगे|" - कुछ खीज कर मैंने इस अध्-पगली बुढिया को समझाने का प्रयत्न किया| जाने कहाँ से वो यहाँ, ऋषि मतंग के आश्रम में आ गयी थी और जाने कहाँ से रामजी से मिलने का विचार अपने ह्रदय से लगा बैठी| गुरूजी ने भी ना जाने क्या सोच कर इस भीलनी को यहाँ रहने की अनुमति प्रदान कर दी| पर जो भी हो, शबरी माई ने अपनी लगन और सेवा-भाव से सभी आश्रम वासियों का मनं जीत लिया| इसी कारण, मैं यदा-कदा शबरी माई को ये रामजी से मिलने के व्यर्थ विचार को त्यागने का सुझाव देता, पर माई कहाँ सुनने वाली थी| लगता था, वो तों राम की भक्ति में लीन हो अपना विवेक और समझ, सब गवां बैठी थी|
मेरी बातें सुन, एक गहरी सांस छोड़ कर बोली, "प्रभु राम बड़े दयालूँ हैं| वो अपने भक्तों का पूरा ध्यान रखते हैं| मैं तों इतनी समर्थ भी नहीं की अपने मुख से उनकी सच्ची प्रशंशा कर सकूं| अगर वो नहीं आये हैं तों इसमें उनका दोष नहीं है| मेरी ही भक्ति में कुछ त्रुटि रह गयी होगी| पर मेरा मन जानता है की वो ज़रूर आयेंगे| जग वालों के लिए मैं अछूत हूँ पर मुझे विश्वास है की राम के स्पर्श से ही मेरी नैया पार लगेगी| तुम देखना, तरु, वो ज़रूर आयेंगे|"
"वाह ऱी मेरी भोली मैया| तुम भी कमाल हो| कितना सरल तर्क दिया है की अगर राम नहीं आये तों इसमें भी तुम्हारी ही कमी है| कहाँ से लाती हो इतना प्रेम और इतनी श्रद्धा| अब भोजन कर लो या फिर राम नाम से ही पेट भर लोगी" - मैं, दीपक जलाते-जलाते बोला और अपनी ऊँगली जला बैठा| शबरी माई तपाक से बोली, "और करो मेरे राम का उपहास| यही होगा तुम्हारे साथ"| हम दोनों हँस दिए!
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कुटिया के बाहर बहुत कोलाहल था| सभी लोग बदहवास से इधर उधर भाग रहे थे| एक पल के लिए मुझे लगा की किसी दानव ने आक्रमण कर दिया है पर लोगों के चेहरे प्रसन्नता से दमक रहे थे| उन पर भय नहीं, ख़ुशी व्याप्त थी| मैंने लगभग भुज का हाथ पकड़ उसे रोका और पुछा, "ये क्या हो रहा है, भुज| सब लोग कहाँ जा रहे हैं"|
"क्या कह रहे हो तुम, तरु| क्या तुम्हे ज्ञात नहीं की आज, श्रीराम हमारे आश्रम में आ रहे हैं| हम सभी लोग उनके स्वागत के लिए जा रहे हैं'| कितने अहो भाग्य हैं हमारे| चलो, तुम भी चलो"| मैंने तुरंत, माई की कुटिया की तरफ देखा| वहां कोई नहीं था|
पूरा मार्ग 'जय श्रीराम' के उच्चारण से गूँज रहा था| लगा, जैसे पक्षी भी यही चहचहा रहे थे| चारों ओर से पुष्प वर्षा हो रही थी| मैं आश्चर्यचकित, ठिठका सा खड़ा था| विश्वास ही नहीं हुआ की स्वय्मं राम और लखन मेरे सामने थे! कितना आलौकिक रूप था उनका, कितना तेजस्वी व्यक्तित्व | जैसा सुना था, उससे कहीं बढ़कर पाया| मेरा सम्मोहन, शबरी माई की वाणी से भंग हुआ ,"देखो तरु, मैं कहती थी ना, मेरे राम आयेंगे! मेरे राम, ये सब लोग मेरा कहा सुनते ही नहीं थे| पर मुझे सम्पूर्ण विशवास था की आप आओगे| कितना समय लगाया आने में| मेरी आँखें सूख गयी आपकी राह तकते तकते!" और ये कहते कहते वो फूट फूट कर रोने लगी! राम भाव-विहल होके माई को सहारा देते हुए बोले, "माँ, अपने पुत्र को क्षमा करो, मैंने बहुत समय लिया आने में!"
आज उस दबी, चुप-चाप सबकी बातें सहने वाली, में जाने कहाँ से इतनी शक्ति आई की उसने लगभग आदेश देते हुए कहा, "राम, सबसे पहले मेरी कुटी में जायेंगे|" बड़ी तेज़ी से, जाने कहाँ से, वो एक बर्तन में जल ले के आई और अपने आँचल से रामजी के चरण-कमल धो धो कर पोछने लगी| अश्रु लिप्त होठों से बोली, "आइये राम| अपनी इस भक्त का निवास धन्य कीजिये"| राम ने स्थान ग्रहण किया| हम सब बाहर से ही इस द्रश्य का आनंद ले रहे थे| शबरी, मंत्र-मुग्ध सी, राम को निहार रही थी और रोती जा रही थी! अनायास ही राम बोले," माँ, बहुत भूक लगी है| कुछ खाने को दो ना!" शबरी जैसे नींद से जागी, "ओह मेरे राम! मुझे क्षमा करो| मैं आपके लिए सुबह ही ताज़े फल लायी थी| प्रतिदिन लाती थी, यही सोच कर, की आप जाने किस दिन आ जाओ|"
मैं बाहर खड़ा मुस्कुरा रहा था और अन्दर, शबरी ख़ुशी में कुछ गाते हुए, अपने लाये हुए बेर एक टोकरी में भर रही थी| उसने पोंछ कर एक बेर राम की तरफ बढाया पर कुछ सोच कर ठिठक गयी| राम उसका चेहरा देख कर मंद मंद मुस्कुराये जैसे उन्हें पता हो की शबरी के मन में क्या चल रहा है| अगले ही पल मेरे पैरों तले धरती खिसक गयी जब मैंने देखा की शबरी ने उस बेर को चखा, मन ही मन कुछ बुदबुदाई और फिर दूसरा बेर चखा| इस बार वो बेर श्रीराम के हाथ में देकर बोली, "प्रभु, ये वाला लीजिये| ये अत्यंत मीठा है| हम सब ठगे से खड़े थे| लक्ष्मण भी कुछ विचलित दिखे| पर राम ने बहुत प्रेम से वो बेर लिया और खा केर बोले," सच में माँ, ये तों बहुत मीठा है"| बस फिर क्या था, अब तों शबरी हर बेर चख कर श्रीराम को देने लगी और राम बड़े चाव से उनको खाने लगे| कितना अदभुध द्रश्य था| जगत के स्वामी अपने भक्त के झूठे बेर खा रहे, और भक्त उनके प्रेम में डूबा, चख चख कर खट्टे और मीठे बेर अलग कर रहा था| शबरी की इंतनी श्रधा देखकर प्रभु श्री राम भी अपनी अश्रुधारा नहीं रोक पाए, फिर हम तों साधारण जीव थे| शबरी का प्रेम कितना सरल, कितना सच्चा और कितना गहरा था |
एक पल ऐसा आया जब मुझे पता ही नहीं चल रहा था की दोनों में से कौन प्रभु है और कौन भक्त| प्रेम ने आत्मा और परमात्मा के इस फर्क को मिटा दिया| मैं बस यही सोचता रहा की संसार में क्या शबरी के इन बेरों से भी अधिक स्वाधिष्ट कुछ हो सकता है?




6 comments:
Prem, shrdha or sabr ka anpum udharan hai shabri ki kehani.
Thx for sharing.:)
ohho...ye to kuch naya hai :)
bachpan mein ye kehani bas ramayan mein dekhi thi...aaj vistar se padhne ko mili ...vaise hindi blog jagat mein aapka hardik swagat hai :)
Is it really you Gaurav... Someone hacked your acount!!!
Dont know how to react, but im smiling for last few minutes :) :)
"आज उस दबी, चुप-चाप सबकी बातें सहने वाली, में जाने कहाँ से इतनी शक्ति आई की उसने लगभग आदेश देते हुए कहा..." this is a good imagination on Sabri's psychology of that moment, liked it. :)
WOW!! :) am speechless...will save it for my kids...
abe kya bakar hai ye..apni hindi test karni thi aur bhi bahut tareeke hain
i can completely recall this part. Have watched the video.
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